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हुक्मरान समझ लें.. ये वक्त तो गुजर जायेगा लेकिन गरीब मजदूरों की आहें नहीं छोड़ेंगी पीछा!

मनोज टिबड़ेवाल आकाश / May 16, 2020
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नई दिल्ली: जैसे ही आज सुबह पहले आंखें खुली, औरैया ट्रक हादसे में 24 से अधिक गरीब मजदूरों के मौत की खबर सुनकर मानो कलेजा मुंह को आ गया। आठ दिन पहले ही महाराष्ट्र में 16 गरीब मजदूरों के ट्रेन की पटरी पर कटकर मरने की दर्दनाक खबर आयी थी। न जाने कितने ऐसे हैं जो भूख-प्यास से दम तोड़ रहे हैं लेकिन इनका कोई हिसाब-किताब नहीं।

क्या औरैया ट्रक एक्सीडेंट और औरंगाबाद रेल पटरियों पर हुई मौतों को सिर्फ हादसा कहकर बचा जा सकता है? क्या इन्हें सिर्फ हादसे में हुई मौतें कहना उचित होगा? क्या इन्हें हत्या नहीं कहा जाना चाहिये? आखिर कोरोना और लॉकडाउन के नाम पर कितने गरीब मजदूरों की मौत (हत्याओं) को हम यूं ही तमाशबीन बन देखते रहेंगे?

सरकार तो ठहरी सरकार! फिर भला इन मौतों (हत्याओं) के लिए, कैसे कोई सरकार को जिम्मेदार ठहरा सकता है?

लोग एक-दूसरे से सवाल पूछ रहे हैं, लेकिन मजबूर हैं, कुछ कर नहीं सकते। लोग सवाल पूछ रहे हैं कि 20 लाख करोड़ के पैकेज का ढ़ोल पीटने वाली सरकार आखिर लॉकडाउन के 50 दिन बाद भी क्यों गरीब प्रवासी मजदूरों को उनके घर तक सुरक्षित पहुंचाने में विफल है? क्या सिर्फ टीवी पर बयानों और अखबारों में विज्ञापन जारी करने से लोग मान जायेंगे कि सरकार वाकई गरीब प्रजा के लिए बेहद संवेदनशील है औऱ हर स्तर पर प्रयास कर रही है कि गरीब अपने घरों को सरकारी इंतजामों से पहुंच जायें।

क्या यह बेहतर नहीं होता कि तीन दिन पहले टीवी पर अवतरित हुए प्रधानमंत्री गरीब मजदूरों के लिए यह ऐलान करते कि हम सभी को मुफ्त में ट्रेन से उनके घर पहुंचायेंगे? कब तक हम कोरोना महामारी के फैलने के नाम पर इन गरीबों को उनके कामकाजी राज्य में रोक सकते है? जब नहीं रोक सकते तो फिर आखिर इन गरीबों की सुरक्षित घर वापसी तो सरकार की जिम्मेदारी बनती ही है?

सरकार रोज नये-नये दावे कर रही है कि हमने इतनी श्रमिक स्पेशल ट्रेनें चलायीं है, रोजाना इतनी बसें चलायी जा रही हैं ताकि गरीब अपने घरों को पहुंच सकें लेकिन जमीनी हकीकत जुदा है। सरकारी दावे खोखले और झूठे साबित हो रहे हैं। सरकार में बैठे नेता योजनायें जरुर बना रहे हैं लेकिन लालफीताशाही की मारी ये सरकार अपने ही नौकरशाहों के पलीतों को समझ तक नहीं पा रही है। प्रधानमंत्री हों या फिर मुख्यमंत्री, तमाम कोशिशें जरुर कर रहे हैं लेकिन उनके मंसूबों पर जबरदस्त पानी फेर रहे हैं जिलों में तैनात डीएम और एसपी।

इनकी तानाशाही के आगे पीएम और सीएम का हर आदेश रद्दी की टोकरी के समान हो जा रहा है। अधिकांश जगहों पर न तो क्रियान्वयन है और न ही जवाबदेही। इन डीएम और एसपी के ऊपर तैनात कमिश्नर और डीआईजी, आईजी अपने पर्यवेक्षणीय दायित्व को कितने बेहतर तरीके से निभा रहे हैं, यह सवालों के घेरे में है? एलआईयू के अफसरों के तो कहने हीं क्या?

काश, औऱंगाबाद और औरैया जैसी घटनाओं के बाद यहां के डीएम, एसपी, कमिश्नर, डीआईजी और आईजी जैसे जिम्मेदार अफसरों को निलंबित कर जेल के पीछे डाल दिया जाता तो शायद तस्वीर कुछ जुदा होती लेकिन ऐसा नहीं है। सिर्फ थानेदार स्तर के लोगों के निलंबन और दो-चार बड़े अफसरों को नोटिस/स्पष्टीकरण मांग सब कुछ रफा-दफा।

हैरान करने वाली बात तो यह है कि अभी तीन दिन पहले ही यूपी सरकार ने एक आदेश दिया है कि कोरोना के संक्रमण की वजह से इस साल किसी अफसर का कोई तबादला नहीं होगा। ये बेहद हैरान करने वाली खबर है। इससे मानो मनबढ़ किस्म के अफसरों को मनमानी का लाइसेंस मिल गया हो।

माना जाता है कि किसी भी आपदा के समय भ्रष्ट किस्म के अफसरों की बांछे खिल जाती हैं। आपदा/महामारी को रोकने के नाम पर बेपनाह बजट आता है और कलाकार अफसर इस समय आने वाले बजट को भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ाने से नहीं चूकते, ऐसे में तबादला न होने की खबर इनके मनमानेपन को बेखौफ बना देती है।

हमारे हुक्मरानों को यह समझना होगा कि ये वक्त तो गुजर जायेगा लेकिन गरीब मजदूरों की आहें आपका पीछा नहीं छोड़ेंगी!


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