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नौकरियां नही दे सकते तो लाठियां क्यों?

मनोज टिबड़ेवाल आकाश / November 4, 2018
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देश और उत्तर प्रदेश की भाजपा नीत सरकारों ने युवाओं को रोजगार के खूब सब्जबाग दिखाये.. समय बीतने के साथ इन वायदों की एक-एक कर कलई खुल रही है। कोर्ट-कचहरी के चक्कर में उलझकर नौजवानों की नौकरी की उम्मीदें दम तोड़ने लगी हैं।

सत्ता में बैठे नुमाइंदों से आज नौजवान पूछ रहे हैं कि अगर आप हमारे घावों पर मरहम नहीं लगा सकते तो कम से कम नमक तो मत ही छिड़किये।

पुलिसिया डंडे के शिकार नौजवान के सिर से बहता खून

शुक्रवार को लखनऊ में जो कुछ हुआ वह हैरान कर देने वाला है। अपनी मांगों को लेकर राजधानी में प्रदर्शन कर रहे सहायक शिक्षक भर्ती के अभ्यर्थियों को जिस तरह से पुलिस के जवानों ने दौड़ा-दौड़ा कर पीटा वह सत्ता में बैठी असंवेदनशील सरकार और पुलिसिया तंत्र की कहानी को खुद-ब-खुद बयां करने के लिए काफी है। लाठियां चटकाकर दर्जन भर से अधिक युवाओं के सिर फोड़ दिये गये। कई लड़कियों को बुरी तरह पीटा गया। खून से लथपथ नौजवानों के सिर और चेहरे देख कोई भी द्रवित हो उठेगा लेकिन सरकार है कि पसीजती ही नही। न तो कोई जिम्मेदार इन प्रदर्शनकारियों से बात करने को तैयार होता है और न ही इनकी समस्या को दूर करने को कोई ठोस तरीका लेकर सामने आता है। मानों सब कान में तेल डालकर सोये हुए हैं।

पुलिस का बेरहम चेहरा, जबरन घसीटकर युवक को ले जाते पुलिस के जवान

क्या लोकतंत्र में नौकरी मांगना और बात न सुनी जाय तो विरोध-प्रदर्शन करना गुनाह है? और क्या इसकी सजा नौजवानों का सिर फोड़ना है?

आये दिन दिल्ली में सीजीओ काम्पलेक्स के बाहर नौजवान देश भर से जुटते हैं और कोशिश करते हैं कि सरकारी नुमाइंदों के कानों पर जूं रेंगे लेकिन हर बार लाठी-डंडों के दम पर इनकी आवाज को अनसुनी कर दी जाती है।

किसी भी देश का भविष्य वहां के नौजवान होते हैं लेकिन इनके सपने को हर बार कुचलने का काम किया जाता है। इनके सपनों को पंख लगे इससे पहली ही इनके पंखों को तोड़ दिया जा रहा है।

क्या कभी किसी ने सोचा कि ये नौजवान किस तरह गरीबी में पढ़कर एक अदद नौकरी की तलाश करते हैं? कैसे इन्हें कोर्ट-कचहरी के चक्कर में उलझा दिया जाता है और ये अपना पेट काट महंगे वकीलों की फीस का इंतजाम कर केस लड़ते हैं सिर्फ इस आस में कि इन्हें पेट पालने का एक रास्ता मिल जाये।

बड़ा सवाल.. आखिर कब बदलेगी ये तस्वीर?


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2 thoughts on “नौकरियां नही दे सकते तो लाठियां क्यों?

  1. मनोज जी नमस्कार मैं आपके बात से पूरी तरह सहमत हूं कि बेरोजगारों की मांगों को दबाने के लिए सरकारें हैं लाठी का सहारा लेती रही हैं और ले रही हैं युवा वर्ग सदैव सरकार से अपेक्षा करता है कि वह नौकरियां मुहैया कराने और क्यों ना हो सरकारी ही वादा करती हैं कि वह बेरोजगारों को युवाओं को नौकरी प्रदान करेंगे लेकिन आने के बाद ढाक के तीन पात ऐसे में युवाओं को सरकारी नौकरी के बजाए खुद अपना व्यवसाय या खुद अपना उद्योग शुरू करके सरकार को यह संदेश देना चाहिए कि वह इन के मोहताज नहीं हैं किंतु ऐसे युवा जो सरकारी क्षेत्रों में जाना चाहते हैं उनके लिए रोजगार उपलब्ध कराना सरकार की जिम्मेदारी है और यह भारतीय संविधान के फंडामेंटल राइट्स का सटीक उदाहरण है प्रत्येक व्यक्ति को रोजगार मुहैया कराना सरकार की जिम्मेदारी है किंतु युवाओं पर पुलिस बल द्वारा बलपूर्वक उनकी इच्छाओं का दमन करना यह विस्फोटक चिंगारी बन सकती है जो कभी भी उग्र रूप धारण कर सकती है विनय कुमार पांडे एडवोकेट मानवाधिकार कार्यकर्ता सिविल कोर्ट जनपद महाराजगंज उत्तर प्रदेश

  2. बेरोजगार युवकों के साथ अत्यन्त क्रूरता व भद्दा मज़ाक,लाखों ही नही बल्कि करोड़ों लोग इन्तजार करते करते नौकरी पाने की निर्धारित उम्र सीमा पार करते जा रहे हैं या फिर पार कर चुके हैं।इन सत्ताधीशों को तनिक भी शर्म नही आती है ,ये सभी संवेदनहीन हो गये है। बेरोजगारों को पांच साल से सब्जबाग़ दिखाते रहे, सरकारी नौकरियों को धीरे-2 समाप्त करके प्राइवेटाइजेशन कर अधिकांश सेवाओं को ठेकेदारों को सौपती जा रही है, जहां पर लोगों को न्यूनतम सेलरी देकर अत्यधिक काम लेते हुए शोषण हो रहा है,नतीजा हर क्षेत्र के कार्यो की गुणवत्ता बुरी तरह प्रभावित हो रही है।

    ऐसे सामयिक व ज्वलंत मुद्दे को उठाने हेतु आपको हार्दिक साधुवाद।🙏🏻🙏🏻🙏🏻

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